गाली देने की आदत और उससे मिलने वाली एक कड़वी सीख
लेखक: प्रकाश राने
भूमिका
हेलो दोस्तों, मैं प्रकाश राने।
आज मैं आपको एक ऐसी बात सिखाना चाहता हूँ, जो उम्मीद करता हूँ कि आपके काम ज़रूर आएगी। यह कोई कहानी नहीं, बल्कि मेरी ज़िंदगी का एक सच्चा अनुभव है, जिससे मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला।
घटना की शुरुआत
आज मैं कंपनी में कुछ लड़कों के साथ था। हम आपस में बातचीत कर रहे थे। वहीं मैं और मेरा एक साथी आपस में सामान्य मज़ाक कर रहे थे। हम दोनों ही हँसी-मज़ाक में बात कर रहे थे।
तभी हमारे पास खड़ा एक लड़का, जो हमारे साथ ही था, अचानक अपने मुँह से किसी अनजान व्यक्ति के लिए—जो वहाँ मौजूद भी नहीं था—उसकी माँ को लेकर गाली (माँ की चु...)* बोल देता है।
मैं उसके सामने ही खड़ा था और मुझे लगा कि बात सीधे मेरे लिए नहीं कही गई है। फिर भी मैंने दखलअंदाज़ी करते हुए उससे कहा—
“भाई, माँ को लेकर ऐसा नहीं बोलना चाहिए।”
बात बिगड़ने लगी
यह बात सुनते ही वह लड़का अचानक अलग ही मूड में आ गया। मैंने उसे समझाने की कोशिश करते हुए कहा—
“देख भाई, ऐसा नहीं बोलना चाहिए, क्योंकि माँ सबकी एक जैसी होती है—चाहे अपनी हो या किसी और की।”
लेकिन इतना कहते ही उस लड़के का मूड और ज़्यादा खराब हो गया और वह मेरी माँ-बहन को लेकर गालियाँ देने लगा। मुझे भी थोड़ा गुस्सा आया, लेकिन मैंने अपने दिमाग को शांत रखते हुए बस इतना कहा—
“भाई, (माँ की चु…) तो तेरी भी है।”
हालाँकि मैं समझता था कि यह बोलना भी ठीक नहीं होगा, लेकिन उसके बर्ताव ने मुझे यह बोलने पर विवश कर दिया।
स्थिति हाथ से निकल गई
बस मेरा इतना कहना ही उसे और गुस्सा दिला गया और उसने मेरा गला पकड़ लिया। तभी मेरा साथी बीच में आकर उसे रोकता है। अगर वह समय पर न आता, तो बात और भी बिगड़ सकती थी।
एक बड़ी सच्चाई
इस घटना से मुझे एक बहुत बड़ी सच्चाई समझ में आई—
जब तक गालियाँ दूसरों की माँ तक रहती हैं, तब तक लोगों को मज़ाक लगता है।
लेकिन जब वही बात अपनी माँ पर आती है, तो वही इंसान गुस्से से भर जाता है।
मेरी सोच और मेरा अनुभव
दोस्तों, मेरा मानना है कि महिलाएँ—चाहे अपने घर की हों या दूसरों के घर की—सब सम्मान की हक़दार होती हैं। मैं आप सभी से निवेदन करता हूँ कि गालियाँ न दें, खासकर महिलाओं को लेकर।
मैं हमेशा कोशिश करता हूँ कि मेरे मुँह से गालियाँ न निकलें और अगर कभी गलती से निकल भी जाती हैं, तो मुझे उसका पछतावा होता है।
एक समय ऐसा भी था जब मेरे मुँह से एक भी गाली नहीं निकलती थी और मुझे गाली देना आता ही नहीं था। लेकिन कुछ ऐसे लड़कों के साथ उठना-बैठना हो गया, जो हर छोटी-छोटी बात पर गालियाँ बोलते थे। उसी वजह से मैं भी धीरे-धीरे इस आदत का शिकार हो गया।
फिर भी, मैं आज भी पूरी कोशिश करता हूँ कि मुझे गालियाँ न बोलनी पड़ें।
✨ सीख / संदेश
गाली देना कोई मज़ाक नहीं, बल्कि सोच की कमी है।
जो इंसान अपने शब्दों पर काबू नहीं रख पाता, वह अपने गुस्से पर भी काबू नहीं रख सकता।
माँ-बहन को लेकर कही गई गालियाँ सिर्फ शब्द नहीं होतीं,
वे सम्मान, संस्कार और इंसानियत पर चोट होती हैं।
अगर हमें एक बेहतर इंसान बनना है,
अगर हमें एक बेहतर समाज बनाना है,
तो शुरुआत अपनी ज़ुबान से करनी होगी।
👉 गाली नहीं, समझदारी बोलिए।
👉 गुस्सा नहीं, सोच रखिए।
👉 और सबसे ज़रूरी — सम्मान ज़िंदा रखिए।
अगर आप चाहें तो मैं इसे
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में भी बदल सकता हूँ।
